राग दरबार : मनोविज्ञान की राजनीति

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Politics of Psychology

लॉर्ड मैकाले का तो नाम सुना ही होगा आपने? अजी वही, मैकाले शिक्षा नीति वाले! जब कई सालों के प्रयास के बाद भी अंग्रेज़ हमारे ऊपर क़ाबू नहीं कर पाए तो उन्होंने एक नया तरीका निकाला हमें ग़ुलाम बनाने का। ये बात अंग्रेज़ अच्छी तरह समझ चुके थे कि भारत पर शासन करने के लिए भारतवासियों के मन को ग़ुलाम बनाना होगा और ये तभी संभव हो सकता है जब उन्हें उनके गौरवपूर्ण अतीत से काट दिया जाए, जब उन्हें ये विश्वास दिलाया जाए कि तुम्हारा तो कुछ था ही नहीं, जो भी अच्छा था या है वो तो पश्चिम का है। और यहाँ से शुरू हुई एक नई शिक्षा नीति जिसे इसके जन्मदाता के नाम पर मैकाले शिक्षा नीति कहते हैं। ये वही शिक्षा नीति है जिसका लक्ष्य है क्लर्क पैदा करना, चाहे वो मैट्रिक पास हो या एम्.ए. पास। इसी शिक्षा नीति का परिणाम है कि आज हम आर्यों को बाहर से आया मानते हैं, द्रविड़ और आर्य को दो अलग “रेस”, गौ-भक्षण को मौलिक अधिकार और जनेऊ धारण करने को पिछड़ेपन की निशानी!

अब प्रश्न उठता है कि आखिर इतनी लंबी-चौड़ी बातें किसलिए? चलने दो ना जो चल रहा है, अंग्रेज़ तो गए, हम तो भले-चंगे हैं ना! जो होना था, वो तो हो गया। अब तो सब ठीक चल रहा है ना? यहीं तो आप धोखा खा गए ज़नाब! ज़रा आँखें खोलिये, देखिये अपने आस-पास क्या हो रहा है। कहीं ये मनोविज्ञान की राजनीति अभी भी तो नहीं खेली जा रही? अच्छा, भक्त कहते ही क्या आता है आपके दिमाग में? एक तिलकधारी, उग्र, दक्षिणपंथी जिसे नरेंद्र मोदी के बाहर दुनिया दिखती ही ना हो? जिसका अंग्रेज़ी ज्ञान गौण हो और जो फेसबुक और ट्विटर पर ट्रॉल करना अपना मौलिक अधिकार समझता हो? ऐसा क्यों? भक्त तो मीरा थीं, भक्त तो तुलसीदास थे, हनुमान थे भक्त! तो अचानक भक्त ट्रॉल कैसे हो गया? कहीं किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने तो भक्त शब्द को गाली नहीं बना दिया? अच्छा ये बताइये कि पंडित कौन होता है? तिलकधारी, चुटिया वाला जो सत्यनारायण भगवान की पूजा करवाता है? अच्छा, शादी-ब्याह भी करवाता है? अधिक पढ़ा-लिखा तो नहीं होता ना? लेकिन पंडित तो महामना मदन मोहन मालवीय थे जिन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की! पंडित तो जवाहर लाल नेहरू थे और पंडित तो हरि प्रसाद चौरसिया हैं! तो फिर अचानक पंडित एक अल्प-शिक्षित शिखाधारी कैसे हो गया? ये कहीं किसी ख़ास मानसिकता के लोगों ने तो नहीं भर दिया आपके मन में? अच्छा, ये जरूर ध्यान रखिएगा कि बंदा और उस्ताद जैसे शब्द आज भी सम्मानजनक ही हैं।

चलिये ये बताइये कि “नेशनलिस्ट” क्या होता है? भक्त की ही प्रजाति का ही कोई जंतु? क्यों भाई? भगत सिंह नेशनलिस्ट नहीं थे क्या? सुभाष चंद्र बोस या गांधी जी नेशनलिस्ट नहीं थे क्या? फिर आज ये नेशनलिस्ट गालीनुमा कैसे हो गया? रॉकेट साइंस नहीं है ये समझना कि कैसे धीरे-धीरे आज भी हमारी संस्कृति पर प्रहार किया जा रहा है। रामसेतु आपको काल्पनिक लगता है? नासा को नहीं लगता। पुष्पक विमान किसी कवि की उड़ान? क्या आपको बंगाल के सेनवंश के बारे में पता है? नहीं? अल्लाउद्दीन खिलजी को तो खूब जानते होंगे आप! रॉकेट साइंस नहीं है ये समझना कि कैसे धीरे-धीरे आज भी हमारी संस्कृति पर प्रहार किया जा रहा है और हमें हमारी जड़ों से दूर ले जाया जा रहा है। यही तो है जी मनोविज्ञान की राजनीति। मन पर प्रहार करो, सामनेवाले की हर चीज को काल्पनिक या ओछे स्तर का बताओ और फिर करो अपना एजेंडा सेट। आज भक्त गाली है, कल भगवान भी गाली हो जाएंगे। आँखें खोलिये, अंग्रेज़ कहीं नहीं गए, वो यहीं हैं, इसी देश में, मेरे और आपके बीच में छुपे हुए हैं। पहचानिये लॉर्ड मैकाले की इन संतानों को और बताइये इन्हें कि भाई, रहने दो! तुमसे ना हो पायेगा।

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