बिहार आँखों देखी : गुंडागर्दी का राज्य, गली-गली पनप रहा अपराध

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अपराध की वारदातें तो आये दिन हमारे देश के हर राज्य में होती रहती हैं। लेकिन, अगर बिहार की बात करें तो यहाँ अपराध महज एक वारदात नहीं रह गया है। अपराध को अपना पेशा बनाने वाले वाले छोटे-बड़े पूंजीपतियों और अपराधियों का बिहार के शहर से लेकर गाँव तक, हर जगह  का बोलबाला है। हत्या, अपहरण, जातीय हिंसा, भ्रष्टाचार, नरसंहार और वसूली जैसे जघन्य अपराध से भरा बिहार सुशासन की परिभाषा तो दूर, इस शब्द से इस प्रदेश का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।

बिहार में गुंडागर्दी, बदमाशी और चोरी की घटनायें काफी आम बातें होती हैं और इसका साक्षी मैं बचपन से रहा हूँ। शराब की बोतलें और पत्थर घर आँगन में फेंक कर दहशत का माहौल बनाया जाता था। किसी परिवार को इतना सताया जाता था कि वो शहर या गाँव छोड़ने पर मजबूर हो जाये। उस समय गाँव-घर में मुखिया और सरपंच भी सबूत पूछते थे । निकट की कोतवाली बिना पैसे लिए आना तो दूर, शिकायत भी दर्ज नहीं करते थे। अंततः लोग परेशान होकर या तो अपनी जगह छोड़ने पर मजबूर हो जाते थे या फिर गुंडे मवालियों को पैसे देकर समझौता कर लेते थे। गाँव का सरपंच हो या जिले का पदाधिकारी, सब अपराध की वारदातों से अनभिज्ञ सिर्फ अपने घर-परिवार को संवारने में ध्यान देते थे। चारों तरफ एक भय का माहौल हुआ करता था।

लोगों की उम्मीदें तब जगी जब बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी और नितीश कुमार मुख्यमंत्री बने। लोगों को लगा कि बिहार से अपराध का उन्मूलन होगा, लेकिन बिहार के लोगों की बदकिस्मती ही कहिये या उनकी असाक्षऱता, लालू के जंगलराज से उन्हें मुक्ति आंशिक या अत्यंत अल्पकालीन ही मिली। सत्ता लोलुपता और अहं ने नितीश कुमार को लालू से जा मिलाया और आज बिहार की दशा बद से बदतर होती जा रही है।

सेवा से निवृत होने के बाद एक सरकारी कर्मचारी जब बिहार में अपने पैतृक घर आकर उसे नया रंग रूप देना चाहता है तब उसे अपने पड़ोसी द्वारा मारने पीटने की धमकी दी जाती है। एक 60 वर्ष के बुजुर्ग पर गुस्से और अहंकार में नवयुवक हाथ उठाने पहुँच जाता है लेकिन लोगों की आँखे शर्म से किंचित नहीं झुकती। खून पसीने से अर्जित उसके खेतो पर अवैध अतिक्रमण हो चूका होता है जिसे बचा पाना उसके लिए असंभव सा हो जाता है। गाँव के उपद्रवी इस तरह से पैसा कमाने का मौका पाते हैं और सुलह करने के नाम पर पैसे ऐंठने का धंधा चलाते हैं। इनके चंगुल में फँसने के बाद फैसला कभी नहीं हो पाता, अपितु ये विवाद दिनों दिन बढ़ता जाता है। इसे बढ़ाने-चढाने वाले वहाँ के स्थानीय लोग ही रहते हैं। 10-12 साल के बच्चे जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए वो लोहे की सरिया, लाठी और लोहे की धारदार हथियारों से मरने-मारने को उतारू रहते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की सामने एक बुजुर्ग है। वो उम्र का कोई ख्याल नहीं रखते, घर घुसकर माँ-बहन की गन्दी गालियाँ देते है और धमकाते हैं। यहाँ क्षेत्रीय प्रसासन आज भी दो दशक पीछे लालू के जंगलराज में जी रहे हैं और उनकी कार्यवाही काफी सुस्त या नाकाफी होती है। यहाँ स्थानीय लोगों से धमकी का दौर हमेशा रोजाना चलता ही रहता है और हर गुंडा बदमाश ब्लैकमेल करके पैसे मांगता है, डराता है और घर से लेकर ज़मीन पर दिन दहाड़े कब्ज़ा करने की भी धमकी देता है। इन सब में स्थानीय गुंडे और मवालियों के साथ सरपंच से लेकर कई जगह गांव के मुखिया भी सामिल रहते हैं और अत्यंत बेशर्मी से कहते हैं कि इसने हमें वोट नहीं दिया था इसलिए इन सबका जीना दूभर कर देना चाहिए।

आक्रोश और गुस्से में हर वक़्त लिप्त रहने वाले ये उपद्रवी लोग अकेले में पाकर आपको घायल कर जायेंगे इसका डर लोगो में देखा जा सकता है। गुंडे बदमाश बनाये नहीं जाते, बल्कि ऐसे लोगो को जब सह मिलता जाता है तो वो धीरे धीरे बड़े अपराध करते हैं और इन्ही में से आगे चलकर कोई शहाबुद्दीन बन जाता है तो कोई शार्प शूटर। उच्चस्तरीय प्रशासन का नियंत्रण निचले और ग्रामीण स्तर पर बिलकुल भी नहीं है और बिहार में अपराध फल फूल रहा है। अपराधी जो राजग सरकार के दौरान अल्पकालीन शांत होकर बैठे थे, फिर से सक्रिय हो गए हैं और अपहरण, हत्या जैसी संगीन घटनाओ को धरल्ले से अंजाम दिए जा रहे हैं। अधिकांश युवा शिक्षा विहीन हैं, वो गलत तरीके से पैसे जुगाड़ने के फ़िराक में रहता हैं और इसके लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहता हैं। सुबह उठकर गली नुक्कड़ या किसी भी चौक चौराहे पर इन्हें ताश खेलते हुए, तम्बाकू, गुटखा या सिगरेट फूँकते हुए देखा जा सकता है। यहाँ सूद पर पैसे देकर उसके ऊपर चकवृद्धि ब्याज दर जिसे यहाँ की स्थानीय भाषा में कटबी कहा जाता है उसपर पैसे वसूलने का धंधा चलता है। अतिक्रमण इस कदर बढ़ चुका है कि हर सड़क गली बन चुकी है। कई जगह गाड़ियाँ तो दूर, दो पहिया वाहन भी बमुश्किल निकल पाते हैं। सड़क पर चलते हुए किसी से साइड मांगना या किसी को ओवरटेक करना जानलेवा साबित हो सकता है। इस बात का जीता जागता उदाहरण अभी पिछले दिनों सुर्खियों में था।

अगर आप एक शरीफ और शांतिप्रिय व्यक्ति हैं तो बिहार की आपराधिक छवि और गुंडागर्दी से भरे इस माहौल में आपका जीना अगर नामुमकिन नहीं तो अत्यंत कठिनाइयों से भरा जरूर रहेगा। नामुमकिन इसलिए नहीं है क्योकि बिहार में अपराध पर अंकुश लगाने वाले कुछ कर्मठ और ईमानदार अफसर के साथ कुछ पुलिस अधिकारी और पदाधिकारी हैं जो दिन रात इन गुंडे-माफिया का सामना करते हैं और हमारे आपके जैसे शरीफ-शांतिप्रिय लोगो के मन में बिहार में बदलाव की उम्मीद जगाये रखे हैं। बिहार में आप एक मूकदर्शक बने रहिये, आपके अगल बगल जो कुछ भी घट रहा है उसे देखकर अपनी आंखे बंद कर लीजिये तो हो सकता है अच्छा नहीं परंतु आप ठीक ठाक जीवन व्यतीत कर पायें।

बिहार के सुशासन का कड़वा सच यही है। लोगो में शिक्षा का अभाव दशकों से बनाकर रखा गया है, युवाओं को मक्कारी और कामचोरी का रास्ता दिखाकर अनैतिक और आपराधिक घटनाओ को अंजाम दिया जाता है। यहाँ अधिकतर काम बिना रिश्वत के नहीं होता और क्षेत्रीय विकास के लिए 8-9वीं पास लोग सरपंच और मुखिया बने बैठे हैं। खैर, जिस प्रदेश का उपमुख्यमंत्री 9 कक्षा तक मात्र पढ़ा हो वहाँ इन सब पदों की योग्यता पर सवाल उठाना भी एक अपराध ही माना जायेगा। बिहार की परिस्तिथि इस से ज्यादा विस्तृत और भयावह है और जिसपर बीती या बीत रही है वो इस बात को अच्छे से जानते हैं। बिहार की आपराधिक छवि और दिनों दिन हो रही बदतर हालत के बाद यही कहा जा सकता है:
“अगर बेमौत मरना है संसार में, तो आइये कुछ दिन गुजारिये बिहार में ।”

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