जलता बंगाल भाग-१

बंगाल इतिहास में अपनी संस्कृति, संगीत, नृत्य, चलचित्र, सम्पन्नता, राजनीति एवं प्राकृतिक धरोहर को सहेजे हुए एक अद्भुत और सौम्य राज्य है। ऐसा राज्य जिसकी पहचान ‘दुर्गा पूजा’, अरविंदो घोष, रबिन्द्रनाथ टैगोर, भागीरथी-हुगली, सुंदरवन और ‘रोसोगुल्ला’ रही है।

भारत के प्रागैतिहासिक काल के इतिहास में भी बंगाल का विशिष्‍ट स्‍थान है। सिकन्दर के आक्रमण के समय बंगाल में गंगारिदयी नाम का साम्राज्‍य था। गुप्‍त तथा मौर्य सम्राटों का बंगाल पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। बाद में शशांक बंगाल नरेश बना। कहा जाता है कि उसने सातवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर-पूर्वी भारत में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके बाद गोपाल ने सत्ता संभाली और पाल राजवंश की स्‍थापना की। पालों ने विशाल साम्राज्‍य खड़ा किया और चार शताब्‍दियों तक राज्‍य किया। फिर कई मुस्लिम शासकों ने बंगाल पर शासन किया, जिसमें मुगल भी शामिल थे।

मुगलों के पश्‍चात् आधुनिक बंगाल का इतिहास यूरोपीय तथा अंग्रेजी व्‍यापारिक कंपनियों के आगमन से आरंभ होता है। सन् 1757 में प्लासी के युद्ध ने इतिहास की धारा को मोड़ दिया जब अंग्रेजों ने पहले-पहल बंगाल और भारत में अपने पांव जमाए। सन् 1905 में राजनीतिक लाभ के लिए अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया लेकिन कांग्रेस के नेतृत्‍व में लोगों के बढ़ते हुए आक्रोश को देखते हुए 1911 में बंगाल को फिर से एक कर दिया गया। इससे स्‍वतंत्रता आंदोलन की ज्‍वाला और तेजी से भड़क उठी, जिसका पटाक्षेप 1947 में देश की आजादी और विभाजन के साथ हुआ। 1947 के बाद देशी रियासतों के विलय का काम शुरू हुआ और राज्‍य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की सिफारिशों के अनुसार पड़ोसी राज्‍यों के कुछ बांग्‍लाभाषी क्षेत्रों को भी पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी है और पिछले 35 सालों से (1977 से) यहां वामपंथियों की सरकार है। एक बात यहां जरूर पक्के तौर पर कही जा सकती है कि तकरीबन 70 साल के बाद बंगाल फिर से सांप्रदायिकता की राजनीति में फंसता हुआ दिख रहा है। इसकी पहली जिम्मेदारी ममता बनर्जी पर है जिन्हें 2011 और 2016 के चुनावों में भारी जीत मिली थी। वे जानती हैं कि उनकी इस जीत के पीछे उस मुस्लिम वोटबैंक का सबसे अहम योगदान है जो वामपंथी पार्टियों का पाला छोड़कर तृणमूल कांग्रेस के साथ आ चुका है।

2011 की जनगणना के मुताबिक बंगाल में तकरीबन 24 फीसदी मुसलमान हैं। इस मामले में बंगाल से आगे सिर्फ असम है जहां 34 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय की है। ममता बनर्जी ने यहां तुष्टिकरण की राजनीति को खूब आगे बढ़ाया है। मुसलमानों को नौकरी में आरक्षण देने से लेकर इमामों को भत्ता देने जैसे तृणमूल सरकार के फैसलों के चलते यहां भाजपा को भी यह कहने का मौका मिल गया है कि ममता बनर्जी ‘हिंदू विरोधी’ हैं। तुष्टिकरण की इस राजनीति में फंसकर ममता बनर्जी मुसलमानों के त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती और इफ़्तार पार्टी देती जा सकती है।

ममता बनर्जी द्वारा अपनाई गई यह रणनीति बंगाल को सांप्रदायिक संघर्ष की फिसलन भरी राह पर धकेल सकती है। बंगाल 1930 और 1950 के दशक में ऐसे ही हालात का सामना कर चुका है। तब संयुक्त बंगाल का कुलीन हिंदू तबका इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि लोकतंत्र के नाम पर राज्य में मुस्लिम दबदबे वाली सरकार का गठन हो।

ममता बनर्जी को इस समय बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक तानेबाने को तोड़ने के बजाय अच्छा प्रशासन देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर हम राजनीतिक नफे-नुकसान की बात करें तो उस लिहाज से भी यही रणनीति उनके लिए सबसे मुनासिब है।

बंगाल हमारा प्यारा बंगाल, आज कौमी ताकतों द्वारा जलाया जा रहा है, यह सब पहले भी हुआ परन्तु अब हालात बदतर हैं क्योंकि कम्युनिस्टों और तथाकथित बुद्धिजीवियों की सुनियोजित और सुसज्जित फ़ौज इन कौमी दंगों का समर्थन करती है और ये देशद्रोही भारत को तोड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं……

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