रानी अबक्का देवी: समय की परतों में दबा एक परम वीर व्यक्तित्व

Veer Avakka Rani

प्रस्तुत काल में एक बेहद ही उष्म सामाजिक सोद्देश्यता का विषय बनकर उभरा है: महिला सशक्तिकरण । इस काल्पनिक वार्तालाप का मुख्य केंद्र है हर एक महिला को एक अभूतपूर्व स्तर का आत्मविश्वास से परिपूर्ण जीवन जीते हुए परिस्तिथियों का जमकर सामना करने के लिए तैयार करना ।

इस दिशा में चिंतन करते हुए एक विचार मनोमस्तिष्क में उभरता है की क्यों न हम भारतवर्ष के असीम और भव्य इतिहास के पृष्ठों से प्रेरणा लें | इतिहास के इन्हीं पन्नो को खंगालते हुए आज हम जानते हैं एक ऐसी वीरांगना को जिसका उल्लेख उतना ही दुर्लभ है, जितना उनका शौर्य और पराक्रम अभूतपूर्व ।

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रानी अबक्का महादेवी दक्षिणी भारत की तमाम किंवदंतियों में वर्णित, स्मृतियों का एक अविस्मरणीय संस्मरण ही नहीं हैं वरन वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सोद्देश्यता आंदोलन की सबसे पहली ऐसी सेनानी भी हैं जिन्होंने पुर्तगाली साम्राज्यवाद के खिलाफ एक सशक्त युद्ध का आह्वान किया था । अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय सवतंत्रता संग्राम का अध्ययन अबक्का देवी के स्मरण के बिना अधूरा है।

अबक्का देवी चौटा वर्तमान भारत के कर्णाटक प्रान्त में मंगलौर के समीप उल्लाल नामक क्षेत्र में तुलनाडु की रानी थीं । वे एक बंत जैन सम्राज्ञी थी । शोध मैं पाया गया है की कर्णाटक के पश्चिम गंगा के मुदिराज सम्राटो द्वारा जैन धर्म का पालन किया जाता था । एक विश्लेषण के अनुसार कर्णाटक के चौटा वंश के सम्राट दरअसल गुजरात के चौडा राजपूत थे जिन्हैं वहीँ के वाघेला वंश ने सौराष्ट्र से बाहर जाने पर विवश कर दिया था । आगे चलकर चौटा सम्राटो ने उल्लाल में कई भव्य स्मारक स्थापित किये जैसे उल्लाल का विशाल सोमनाथेश्वर मंदिर और रानी अबक्का का दर्शनीय किला ।

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रानी अबक्का देवी एक बेहद ही शक्तिशाली और आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिन थी जिनकी वीरगाथाएं पूरे दक्षिण भारत में बेहद ही गर्व और उत्साह से सुनी और सुनाई जाती थी । उनका वर्चस्व अपार था और चरित्र अदम्य था । अबक्का देवी की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की आज भी उनके शौर्य की गाथाएं, लोक कथाएं और दन्त कथाएं उलाल प्रान्त में प्रसिद्ध हैं ।

भारतीय इतिहास की प्रसिद्ध वीरांगनाओं का वर्णन करते ही जहां झांसी की महावीर रानी लक्ष्मी बाई या १९वी सदी की कित्तूर की रानी चेन्नम्मा की स्मृति तो हमारी आँखों के सामने तुरंत ही आ जाती है, हम में से बहुत ही अल्प होंगे वे लोग जिन्होंने रानी अबक्का की वीरगाथा सुनी हो, हालांकि रानी अबक्का का जीवन काल , रानी लक्ष्मी बाई से ३०० वर्ष पूर्व था । इसका कारण है की बहुत ही सीमित रूप से रानी अबकका और उनके साम्राज्य की जीवन शैली के बारे में किसी भी तरह का गद्य लिखा गया । बल्कि जितनी भी जानकारी इस महान सम्राज्ञी के बारे में खो चुकी है, उसका तो कोई हिसाब ही नहीं है । केवल एक युग से दुसरे युग तक पहुंचाई गयी लोक गाथाओं के द्वारा ही उनका परनण वर्तमानकाल तक पहुँच पाया है | यक्षगान नामक दक्षिणी कन्नड़ मंच की लोक गाथाओं ने अबक्का रानी के जीवन पर काफी प्रकाश डाला ।

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विवरण में पाया जाता है की अबक्का एक साँवल , सुन्दर और साधारण वस्त्रों में रहने वाली एक बेहद ही सहज रानी थीं । उन्हें सदा ही साधारण और आम लोगो के साथ उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए पाया जाता था । अबक्का रानी के साथ एक और जुड़ी ख़ास बात यह है की वे उन अंतिम योद्धाओं में से एक थी जिन्होंने अपनी युद्ध शैली में अग्नि बाण का प्रचुर प्रयोग किया था। पुर्तगाली सेना के विरुद्ध इस अस्त्र का उन्होंने बेहद सफर उपयोग किया ।

एक अन्य किंवदंती के अनुसार अबक्का रानी की दो वीर पुत्रियां भी थी जो उन्हीं के प्रकार पराक्रमी थी । इस प्रकार कुल मिलाकर कथाओं में तीन अबक्का रानियों का वर्णन है । उपरन्तु दन्त कथाओं और लोक कथाओं में तीन रानियों को एक ही रानी अबक्का की संज्ञा दी गयी है ।

विपरीत परिस्थितयों में भी साहस के साथ युद्ध को अंजाम देने का अबक्का रानी का एक विशिष्ट अभिलेख रहा है । उनके तटीय साम्राज्य पर आक्रमण करने वाली सैन्य टुकड़ी के साथ हुए संघर्ष का वर्णन स्थानीय सबूतों में कम मिलता है परन्तु ‘पितरो देला वाले’ नामक प्रसिद्ध पुर्तगाली सैलानी ने अपने संस्मरण में इसका ज़िक्र अवश्य किया है । पितरो वर्ष १६२१ से १६२४ के मध्य भारत आया था और भारत आने के पहले अरबी राजा शाह अब्बास से मिला जिसने रानी अबक्का की वीरता का खूब भली भाँती वर्णन उससे दिया । इसके बाद तो पितरो ने मन बना लिया की भारत जाकर अबक्का रानी नामक इस वीरांगना से भेंट अवश्य करेगा । अबक्का देवी की प्रसिद्धि अरब देशों में उनके पुर्तगाली आक्रमण को मुंह तोड़ जवाब देने वाले संघर्ष के कारण हुई थी । चूँकि उल्लाल एक तटीय प्रान्त था, इसलिए वह पुर्तगाली साम्राज्य के लिए सामरिक दृष्टी से एक महत्वपूर्ण पड़ाव था । इसी के चलते पुर्तगाली हमलावर कई बार उलाल प्रान्त पर आक्रमण किया करते थे ।

Pic 4चौटा वंश में एक मातृवंशीय प्रणाली का था । अबक्का के मां तिरुमला राया ने उनकी उल्लाल की सम्राज्ञी ताजपोशी की थी । तिरुमला ने अबक्का का विवाह लक्ष्मप्पा अरसा के संग रचा जो की कुछ समय तक ही चल पाया । उसके पश्चात अबक्का उल्लाल लौट आई और उनके पूर्व पति लसक्ष्मप्पा को यह कतई रास न आया । प्रतिशोध की ज्वाला से ज्वलित होकर लक्ष्मप्पा आगे चलकर पुर्तगाली सेना को अबक्का के विरुद्ध अपना समर्थन देने चला गया ।

तिरुमला राय ने अपनी भांजी को हर प्रकार के युद्ध शैली और द्वंद्व कला में महारथ हासिल करायी थी । सम्राज्ञी बनने की अपेक्षा में उन्होंने हर प्रकार की युद्ध कला और तलवार चालान, शस्त्र चालन तथा राजनीतिक कूटनीति में निपुणता प्राप्त कर ली थी । अंततः जब वे उल्लाल के सिंहासन पर विराजमान हुई, वे एक अति कुशल योद्धा बनकर तैयार हो चुकी थी । यद्यपि अबक्का मूल रूप से जैन पंथी थीं परन्तु वे सोमनाथेश्वर के अपने हिंदू कुलदेव को पूजती थीं । यही नहीं, उन्होंने अपनी सशक्त सेना में समाज के हर वर्ग से सैनिको को एक रूप में शामिल करा था जिसमें मछुवारों का मोगवीरा समूह भी था ।

प्रायः तत्कालीन मूल भारतीय हिन्दू समाज अपने मूल्यों से जुड़े रहने के कारण एकता के भाव से सदा परिपूर्ण रहता था । शायद यही कारण था की जब भी कोई बाहरी आक्रमणकारी भारतवर्ष की पावन धरती पर अपनी आदिग्रहण की बुरी नज़र डालकर आक्रमण करता था, तब यही हिन्दू राज्य अपनी आपस की क्षत्रुता को भूलकर बाहरी शक्तियों से लड़ने के लिए एक हो जाते थे (हालांकि आने वाले समय में यह बदलने वाला था )। रानी अबक्का ने भी पुर्तगालियों के विरुद्ध अपनी सैन्य शक्ति को और प्रबल करने के लिए कलीकट के ज़मोरिन और तुलनाडु के अन्य दक्षिणी नरेशों के साथ गठबंधन निर्मित कर लिया था । इस गठबंधन के चलते पुर्तगालियों का भारत में उल्लाल के तट के द्वारा प्रवेश करना नामुमकिन हो गया था ।

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रानी अबक्का पुर्तगालियों के राह का सबसे बड़ा रोह्ड़ा बनती जा रही थीं । उन्होंने पुर्तगाली सरकार के साथ किसी भी तरह का समझौता करने से स्पष्ट अस्वीक्रति व्यक्त कर दी थी । और तो और, उन्होंने अपनी प्रजा से भी यह आग्रह किया था की किसी भी प्रकार से पुर्तगाली आक्रमणकारियों को भारतवर्ष की धरती पर प्रवेश नहीं करने देना है । अपने निडर, निस्वार्थ और चतुर सामरिक गुणों के चलते अबकका रानी को एक बहुत ही उचित संज्ञा, रानी अभया दी गयी थी ।

एक पुर्तगाली गद्य जिसमें उन्हें बुका देवी चौटा के नाम से दर्शाया गया है, एक घाटन का विवरण देता है जिसमें अबक्का देवी ने अपनी सेनाओं के साथ एक पुर्तगाली मोर्चे पर एक रात मंगलौर में बिना किसी चेतवानी अकस्मात् आक्रमण कर दिया था जिसमें कईं पुर्तगाली सैनिक हताहत हुए थे । परन्तु अगले ही दिन पुर्तगालियों ने सारे नगर को भीषण अग्नि से ग्रसित कर दिया था जिसके पश्चात अबक्का देवी को वहां से बच कर निकलना पड़ा ।

उल्लाल पर पुर्तगाल का सबसे पहला आक्रमण सन १५२५ में हुआ था जिसके बाद से ही अबक्का ने अपने आप को भविष्य में होने वाले हमलो के विरुद्ध तैयार और प्रतिबद्ध कर लिया था । वर्ष १५५५ में पुर्तगालियों को किसी भी प्रकार का लगान देने से मन कर देने के बाद पुर्तगलियों ने रानी अबक्का पर आक्रमण करने के लिए अपनी नौसेना के प्रधान सेनापति डॉन अलवरो डा सिल्विरेरा को भेजा था । अबक्का ने अपनी पूरे आक्रामक बल और साहस से इस आक्रमण को विफल कर दिया और पुर्तगालियों को पीछे हटना पढ़ा ।

परन्तु उसके बाद वर्ष १५५८ में पुर्तगालियों ने अपनी बर्बरता की सभी सीमाएं पार कर दी और एक और बड़ा हमला मंगलौर पर किया जिसमें कइयों युवको और बुज़ुर्गो को मृत्यु के घात उतार दिया । इसके अलावा एक मंदिर को भी नष्ट कर दिया गया तथा एक समुद्री जहाज़ को नष्ट किया गया । अंत में निर्मम पुर्तगालियों ने पूरे नगर को ही आग से नष्ट कर दिया । १५६७ में पुर्तगाली आक्रमणकारियों ने उल्लाल नगर पर हमला किया और अबकका देवी ने उसका पूरी शक्ति से जवाब दिया । उसी वर्ष पुर्तगाली वाइसराय अंटोनी नोरोहना ने एक जोआओ पिक्सोटो नामक आक्रमणकारी को कईं सैनिकों के साथ भेजा जिसने उल्लाल शहर पर हमला कर कब्ज़ा कर लिया । उस्सने राज दरबार में भी प्रवेश करा लेकिन तब तक रानी अबक्का वहाँ से बच कर जा चुकी थीं ।

उसी रात अबक्का ने अपने २०० अति कुशल सैनिको की सहायता से पुर्तगालियों पर फिर से हमला बोल दिया और उनके सेनापति पिक्सोटो का वध कर दिया । साथ ही ७० पुर्तगाली सैनिको को भी मार गिराया । आक्रमणकारियों को विवश होकर अपने जहाज़ों में बैठ कर भागना पढ़ा ।

बचे हुए पुर्तगली सैनिक शराब और नैराश्य में डूबे हुए थे । इसी का फायदा उठा कर अबक्का ने अपने साथ और सैनिकों को मिलाकर उन सब को भी मार गिराया । इसी संघर्ष में पुर्तगाली सेनापति मास्करेन्हास का भी वध कर दिया गया । अंततः पुर्तगाली सेना को उस समय भारतवर्ष छोड़कर भागना पढ़ा ।

परन्तु इस सबके बावजूद भी अबक्क़ा को सम्पूर्ण वीरता से लड़ते हुए भी इस युद्ध में हार का सामना करना पढ़ा क्यूंकि उनके पूर्व पति लक्ष्मप्पा बंगा ने अपने प्रतिशोध के लिए उनके विरुद्ध पुर्तगालियों से गठबंधन कर लिया और अबक्क़ा की बेहद गोपनीय युद्धविद्याओं और योजनाओं के बारे में किसी तरह पुर्तगाली सेनापतियों को खबर दे दी ।

पुर्तगालियों ने अबक्का देवी को हिरासत में ले लिया और उन्हें कारावास में कैद कर दिया । परन्तु अबक्का एक जन्मजात योद्धा थी और उन्होंने कारावास में रहते हुए भी एक एक पुर्तगाल विरोधी आंदोलन आरम्भ कर दिया । परन्तु तत्पश्चात पुर्तगालियों ने ऊके इस आंदोलन के ऊपर दबाव उत्पन्न कर दिया और इसी संघर्ष में अंततः अबक्का वीरगति को प्राप्त ही गयीं । मरते दम तक उन्होंने एक शेरनी की तरह दुश्मनो का डट कर एक न मानी ।

pic 6इस कल्पना से भी अधिक शूरवीर सम्राज्ञी का स्मरण हालांकि किया तो आज भी स्थानीय प्रांतो में बड़े ही गर्व और गौरव से किया जाता है परन्तु उनके सम्मान को असली महत्त्व हाल ही में सौंपा गया जब बैंगलोर शहर में उनका एक स्मारक स्थापित किया गया । यह स्मारक मन में फिर से युद्ध और संघर्ष के उन बीते दिनों की स्मृतियों को जीवित कर देता है और रानी अबक्का की स्वाभिमान, सबलता, पराक्रम और सर्वप्रिय छवि को उकेर देता है ।

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हालांकि हमारे युवा वर्ग और छात्रों के लेखन पठन के गद्य और इतिहास पुस्तिकाओं में रानी अबक्क़ा का सचित्र विवरण आना ही उनके शौर्य और बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

हुतात्मा रानी अबक्का देवी चौटा के जीवन से सीख लेकर आधुनिक युग की महत्वकांक्षी महिला का भी एक परिस्थितियों से कभी न घबरा कर अदम्य उत्साह और शौर्यवान चरित्र का जीवन जीना, एक अत्यंत ही प्रगतिवान विचार है । हमारी ऐसी आशा है की आज का युग बीते समय की इस किंवदंती से प्रेरणा लेकर उनके जीवन मूल्यों का भरपूर लाभ उठाएगा ।

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