सनातन पराक्रम, अनश्वर अभिप्रेरणा: भाई सती दास एवं मती दास

बलिदान । विश्वास । सहनशक्ति । अपनी श्रद्धा का साथ देने के लिए आप इन भावनाओं को लेकर किस हद तक जा सकते हैं? आज बंद कमरों में बैठे हुए और इंटरनेट पर सुरक्षित रूप से अपने विचारो और मतभेदों को व्यक्त करने में हमें निमित्त मात्र का संशय या असुरक्षा की अनुभूति नहीं होती । परन्तु कल्पना कीजिए कि आप अपने चारो ओर से एक आक्रामक कट्टरवादी सम्रदाय के जिहादी सिपाहियों से घिरे हो और हर पल अपने विचारो पर प्रतिबन्ध लगे होने के एहसास से पूरित हों.… आपका एक भी तर्क जो इस कट्टरवादी विचारधारा के तर्कों के विरुद्ध जाए, आपकी मृत्यु का भी कारण बन सकता है? सोचकर ही रोंग़टे खड़े हो  जाते हैं, है न? आज शख्सियतों के  अवगत  कराने वाले हैं जिनकी किम्वदन्तीय जीवनी निःस्वार्थ बलिदान की एक वीर  गाथा है । हम बात कर रहे हैं दो नायकों भाई सती दास और मति  दास की ।

भाई सती दास और भाई मती दास दोनों ही भाई हीरा नन्द के सुपुत्र थे । उनके पूर्वज, गौतम दास, मूलतः करियाला ग्राम के निवासी थे । यह स्थान वैसे झेलम प्रान्त का भाग था । सर्वप्रथम गुरु अर्जन देव से प्रेरित होकर उन्होंने सिख पंथ को अपनाया और गुरु अर्जन देव ने ही उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें ‘भाई’ का शीर्षक प्रदान किया । यह सम्मान उनके वंशजो के नाम में वर्त्तमान काल तक कालजयी हुआ । ये बात उस दौर की है जब मुग़ल सेनाएं सारे भारतवर्ष में हिन्दुओं को पकड़ कर बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण करवा रही थी । भारतवर्ष में आतंक का एक ऐसा युग चलन में था । लाखों हिन्दुओं का पूरे देश में वध किया जा चूका था । भाई सती दास और मती दास के दादा भाई प्रगा को गुरु हरगोबिन्द ने मुघलो के विरुद्ध १६२८ इ के प्रथम युद्ध में एक जत्थे की कमान सौंपी थी| युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हुए और अपनी चोटों के कारण वीरगति को प्राप्त हुए । उनके पश्चात भाई हीरा नन्द ने स्वयं को गुरु हर राय के समक्ष सेवा के लिए प्रस्तुत किया । १६५७ इ में अपनी मृत्य से पूर्व उन्होंने भाई मती दास और भाई सती दास को, जो उनके चार सुपुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ थे, गुरु के संस्थान की सेवा का कार्य सुपुर्द किया । और पिता की आज्ञा के अनुरूप, दोनों पुत्रो ने निःस्वार्थ भाव से एवं तन, मन, धन से गुरु के संस्थान की सेवा का कार्य आरम्भ किया ।

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मुग़ल तानाशाह औरंगज़ेब के न्यौते पर भाई सती  दास और भाई मती  दास, गुरु हर कृष्ण के साथ उस से मिलने दिल्ली गए । १६६४ इ में गुरु के परमात्मा में विलीन हो जाने के पश्चात दोनों बंधुओं ने वापस अपने गाँव बकाला में जाकर बस्ने का निर्णय लिया । गुरु तेघ बहादुर के अभिव्यक्त होने पर दोनों बंधुओं ने स्वयं को उनकी सेवा में प्रस्तुत किया । इसी दौरान धीर मल के गुरु न बनने के कारण उसने शिहं मसंद और उसकी टोली के सात मिलकर गुरु तेग बहादुर पर एक जानलेवा हमला करने का विफल प्रयास किया । इस प्रयास के अंतर्गत उन्होंने गुरु के संस्थान से कईं मूल्यवान वस्तुओं को चुराकर अपने खेमे में भी छिपा लिया था । तत्पश्चात दपनो बँधोँ ने माखन शाह को अपना पूरा योगदान दिया और धीर मॉल और शिहं मसंद को बंधक बनाकर गुरु के समक्ष प्रस्तुत करने को संभव बनाया ।

एक दिन गुरु तेघ बहादुर के दीवान, दुर्गा मॉल ने गुरु से विनती करी: “हे गुरु, मैं अपने तन मन और धन से आपकी सेवा में समर्पित हूँ । परन्तु वृद्धावस्था के कारण मेरे लिए अब यह कार्य करना कठिन होता जा रहा है । इन दोनों भतीजो में मैं दो बहुत ही होनहार और पराक्रमी पुत्रों की छवि देखता हूँ ।  यदि आप उचित समझें तो मैं ज्येष्ठ पुत्र माटी दास को दीवान का सम्मान और कनिष्ठ पुत्र सती दास को वज़ीर का सम्मान प्रदान अकरने का निवेदन करूंगा । ” और  वर्षो से सेवारत रहे दीवान का आग्रह मानकर दोनों बंधुओं को ये भूमिकाएं प्रदान करी ।

बहरहाल, पूरे भारतवर्ष के हिन्दुओं को एक इस्लाम में परिवर्तित करने  के इरादे से औरंगज़ेब ने वर्ष १६७४ इ में आक्रामक निर्देश दिए और अपनी इस मुहीम का आरम्भ कश्मीर प्रान्त से ही कर दिया । कश्मीर के राज्यपाल, शेर अफ़ग़ान खान के समक्ष अपना शीश झुकाने के पूर्व, कश्मीर के दीर्घ ब्राह्मण निवासी, पंडित किरपा राम के सानिध्य में आनंदपुर साहिब में २४ मई १६७५ को गुरु तेग़बहादुर से मिले और उन्हें इस विषय में अपनी साड़ी समस्याओं के बारे में आकलन दिया ।
गुरु तेघ बहादुर एक बहुत ही विद्वान और अनुभवी नेता थे और वे इस बात से भली भाँती अवगत थे की निर्बल जनता बहादुरी के किस्से सुनकर बहादुर नहीं होते, वरन निर्भव और महापराक्रमी नेतृत्व के चलते ही इस कार्य को संभव बनाया जा सकता है । उन्होंने कश्मीर से आये ब्राह्मण जान को यह सन्देश दिया की कश्मीरी राज्यपाल से जाकर कहें की हमारे गुरु तेघ बहादुर हैं । यदि किसी प्रकार से मुघलो ने उन्हें इस्लाम अपनाने पर विवश कर दिया तो हम सभी अपनी मर्ज़ी से इस्लाम स्वीकार कर लेंगे । इसकी सूचना मिलते ही औरंगज़ेब ने गुरु तेघ बहादुर की गिरफ्तारी के आदेश दिये। यह आदेश मिलते ही प्रणय के लिए गुरु ११ जुलाई १६७५ को आनंदपुर साहिब से आगरा की ओर अग्रसर हुए । आगरा में जब मुग़ल सैनिक गुरु को गुरफ्तार करने के लिए आगे बढे तो भाई सती  दास और मती  दास ने गुरु के स्थान पर स्वयं को गिरफ्तार करने का आग्रह किया ।

बंदीगृह में गुरु तेघ बहादुर
बंदीगृह में गुरु तेघ बहादुर

औरंगज़ेब से आये द्वितीय आदेश के पश्चार गुरु से इस्लाम अपनाने के लिए प्रबल हठ किया गया । साक्षात रूप से गुरु ने यह आदेश अस्वीकार कर दिया । गुरु को भयभीत कर के धमकाने के इरादे से इस्लामी काजियों ने एक योजना बनायीं । उन्होंने गुरु के साथ अगुवा किये गए सभी सिखों को एक एक कर के यातना देकर और उनका वध करके गुरु की भयादोहन के द्वारा इस्लाम कबूलने पर विविाश करने का खेल खेलना आरम्भ किया । काजियों ने सर्वप्रथम भाई मती  दास को आर्यों के द्वारा कटवा डालने का निर्णय लिया ।

काजियों के आदेश को सुनकर भाई मती  दास गुरु तेघ बहादुर के समक्ष गए और उनसे प्रार्थना की “हे सच्चे बादशाह, मुझे आशीर्वाद दो, की मैं यह बलिदान देकर अपना कर्त्तव्य निभाऊं और धर्म और श्रद्धा का मार्ग और सबल बनाऊँ । ” गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात क़ाज़ी से भाई मती  दास से पुछा “भाई, इस्लाम कबूल कर ले, उसके बाद मुग़ल सरकार तुझे कल्पना से भी अधिक धन दौलत और सुविधायिें प्रदान करेगी । और तो और, अगर तेरी मृत्यु एक मुसलमान के रूप में होगी, तो मरने के पश्चात भी तुझे जन्नत नसीब होगी, जहां, दूध की धाराओं का दोहन करना संभव होगा, तरह तरह का मदिरापान उपलब्ध होगा और ढेर साड़ी महिलाओं का सुख भोगना संभव होगा । पर अगर तूने इस्लाम कबूल नहीं किया तो इस आरी से तेरे शरीर के अभी दो टुकड़े कर दिए जायेंगे । ”

इस पर भाई मती  दास ने उत्तर दिया :

“अपनी श्रद्धा के लिए मैं ऐसे सहस्त्रों स्वर्ग न्यौछावर कर सकता हूँ । मुझे  मदिरा और महिलाओं के सुख से कोई सरोकार नहीं । मेरे लिए तो धर्म के मार्ग पर चलना ही मेरा परम कर्त्तव्य है । “

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यह सुनते ही क़ाज़ी ने उनसे उनकी अंतिम इच्छा के बारे में पुछा, जिसपर उन्हीने कहा की जब उनके शरीर को आरी से दो टुकड़ो में काटा जा रहा होगा तब उनका मुख उनके गुरु की ओर किया जाए ताकि अपनी अंतिम सांस तक वे अपने गुरु का स्मरण कर पाएं । इस परकार, एक संतुष्ट रूप से परमात्मा में लीन  होना संभव होगा ।

और फिर काजियों के निर्देश पर ८ नवंबर १६७५ को भाई मती दास को आरी के टुकड़ो में चीर दिया गया ।

इस मर्मस्पर्शी, पशु रुपी शैतानी कृत्या के पश्चात, दो ही दिनों के अनर्गत, मुग़ल काजियों ने भाई सती दास को कपास के ढेरों में लपेट कर अग्नि से ज्वलित कर देने का आदेश दिया । हमेशा की तरह, मुग़ल काजियों ने अपने नापाक इरादो से भाई सती दास से कहा “अब भी वक़्त है, इस्लाम कबूल कर लो और सुख सुविधा से भरी ज़िन्दगी जी कर खुश रहो “।

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भाई सती दास ने उन्हें उत्तर दिया, “यह समझना तुम मुघलो की समझ शक्ति से पर है की मेरे सुख और सुविधा केवल मेरे गुरु के आदेश का पालन करने में है । मेरे सुख और सुविधा मेरे इस नश्वर शरीर को बचने में नहीं है जिसके प्राण पखेरू एक न एक दिन उड़े ही हैं, यह निश्चित है । “

यह सुनते ही मुग़ल जल्लादो ने कपास के ढेरो में लिपटे हुए भाई सती दास पर तेल दाल कर उन्हें अग्नि से प्रज्वलित कर दिया । आत्मविश्वास और श्रध्दा से ओत प्रोत भाई सती दास ने सहजता से इस्लाम कबूलने के बजाय मृत्यु को स्वीकार किया और कपलान से परे  शौर्य का प्रदर्शन कर वीरगति को प्राप्त हुए ।

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इन ऐतिहासिक शहादतों से एक बात तो साफ़ ज़ाहिर होती है की आज के युग में हम अपने जीवन में होने वाले कईं संकटों, विपदाओं, संग्रामों और समस्याओं की तुलना यदि हमारे इन् पूर्वजो के जीवन प्रत्तान्त से करें, तो वे काफी निम्न स्तर  की समस्याएं लगेंगी। हमारे वर्त्तमान काल के सुखी और स्वछंद सोच वाले भारतवर्ष की स्थापना के पीछे भाई सती दास और भाई मती दास जैसे शूरवीरो के अमानवीय बलिदानो का अनमोल योगदान है । यद्यपि वे अपने आप में मुग़ल आतंकवाद का भारतवर्ष से सफाया न कर पाएं हो, परंतु उन्होंने अपने हठ , स्वाभिमानी सोच और ज़िद्दी बहादुरी से पूरे मुग़ल शासन और औरंगज़ेब जैसे विकराल और उग्र तानाशाहों की नींव को हिला कर रख दिया था ।

हम भाई सती दास और मती दास के अथाह समर्पण और देश एवं धर्म भक्ति को नतमस्तक हो श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं !

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