एक ऐसी सड़क जिसने पूरे गांव को बना दिया विधवा

एक ऐसी सड़क जिसने पूरे गांव को बना दिया विधवा

यूं तो सड़कें विकास का रास्ता होती हैं, जिसके सहारे हम एक छोर से दूसरे छोर तक आने-जाने में सक्षम होते हैं लेकिन तेलंगाना का एक ऐसा गांव भी है जो सड़क की वजह से बर्बादी ओर है।

नेशनल हाईवे-44 के लिए बायपास का काम करने वाली सड़क यहां के पेद्दाकुंता थांडा गांव के लिए बर्बादी का सबब बन चुकी है। इस पूरे गांव में कोई भी पुरुष नहीं है, जिसकी सबसे बड़ी वजह है यह सड़क। इस सड़क को मौत का जाल भी कह सकते हैं जो किसी इंसान को कब अपने गिरफ्त में कर ले ये कोई नहीं जानता।

बर्बादी की ओर है गांव

पेद्दाकुंता थांडा गांव में केवल विधवाएं ही हैं। पूरे गांव में अगर पुरुषों की संख्या की बात करें तो वो केवल एक ही है और वो भी 6 साल का एक बच्चा। पेद्दाकुंता थांडा गांव के पास जब यह बायपास सड़क बनी तो गांव वालों ने खुशियां मनाईं।

गांव वाले सर्विस रोड चाहते थे जो उन्हें पास के ही नंदीगाव तक पहुंचा दे। नंदीगाम पेद्दाकुंता थांडा गांव का पंचायत मुख्यालय जो इस गांव से 5 किलोमीटर दूर है। यूं तो सर्विस रोड आज तक नहीं बन सकी लेकिन जनवरी 2006 में बने इस बायपास पर सड़़क दुर्घटनाओं की शुरुआत हो गई।

सन् 2006 से लेकर अब तक इस सड़क ने अपने गिरफ्त में 80 जानें ले ली हैं, जिसमें 30 केवल पेद्दाकुंता थांडा गांव के हैं और बाकी आस-पास के गांवों से। पेद्दाकुंता की निवासी नेनावथ पद्मा के पति की जान इसी सड़क पर एक हादसे के दौरान चली गई थी। वो बताती हैं इस सड़क पर हफ्ते में 2 से 3 हादसे हो ही जाते हैं।

Accident

कुछ ऐसा ही हाल 39 वर्षीय कोर्रा पन्नी का भी है जिनके तीन बच्चे हैं। उन्होंने अपने दो बच्चों को कोथूर और शादनगर के सरकारी हॉस्टल में भर्ती करा दिया ताकि वो सुरक्षित रहें। वो बताती हैं कि उन्होंने उनका सबसे छोटा बच्चा उनके साथ ही रहता है। पन्नी के मुताबिक यहां काम मिलना भी मुश्किल है।

पन्नी के पति की मौत अगस्त 2013 में इसी सड़क पर हादसे के बाद हो गई थी जब वो मजदूरी कर के लौट रहे थे। इसी गांव की नेनावथ रुक्या का वाकया और भी दर्दनाक है। 52 वर्षीय रुक्या के परिवार के 4 पुरुषों की मौत इसी सड़क पर हादसे के दौरान हो गई थी।

उनके 3 बेटे मल्लेश (26), शंकर (21) और रवि (18) की मौत एक ही हादसे में हो गई थी जब उन्हें एक कार ने टक्कर मार दी थी। 3 बेटों के हादसे में गुजर जाने के गम से रुक्या उबर भी नहीं पाई थी कि 6 महीने बाद ही उनके दामाद की भी वहीं मौत हो गई जहां उनके 3 बेटे मारे गए थे।

रुक्या कहती हैं कि ‘यह सड़क ईश्वर का दिया हुआ श्राप है। आखिर हमने कौन सा पाप किया है? जो इस गांव के सभी पुरुष हादसों का शिकार हो गए।’

पेद्दाकुंता थांडा गांव की मुसीबत सिर्फ हादसों तक खत्म नहीं होती बल्कि रात के समय आसपास के इलाकों के अजनबी लोग गांव के दरवाजों की ओर रुख करते हैं। गांव में बची विधवाओं की उम्र 20 से 38 साल के बीच है।

यही नहीं खत्म होती मुसीबत

रुक्या के 3 बेटों की मौत के बाद उन्हें अपने बहुओं की चिंता सता रही थी, क्योंकि आस-पास के गांव के लोग विधवा बहुओं के साथ जबरदस्ती करने की ताक में थे। उन्होंने अपनी बहुओं की इज्जत बचाने के लिए उन्हं उनके मायके वापस भेज दिया।

इसी गांव की सीता (बदला हुआ नाम) का कहना है कि ‘हमें में से कुछ विधवाओं को परिवार का पेट भरने के लिए कमाना पड़ा। जो पुरुष हमारे साथ रात बिताने को तैयार हैं वे जानते हैं कि जबतक वे पैसे देंगे तब तक वे यहां आ सकते हैं’। सरकार ने विधवाओं को पेंशन देने का फैसला किया है, लेकिन इसके लिए भी उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर नंदीगाव जाना पड़ता है।

Source : Amar Ujala

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