क्या सिर्फ वोटों के लिए राजपूतों का इस्तेमाल कर रही है काँग्रेस पार्टी ?

राजस्थान में विधानसभा चुनाव के चलते सियासी घमासान जोरों पर है। पिछले दिनों बीजेपी के संस्थापक सदस्य में से एक रहे मारवाड़ के दिग्गज राजपूत नेता जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह ने स्वाभिमान रैली कर बीजेपी से बगावत करके कांग्रेस का दामन थाम लिया था।

और ऐसे में राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर राजपूतों के ईर्द-गिर्द आ गई है ।लेकिन राजनीतिक जानकारों की माने तो मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में जाने से पहले कुछ शर्तें जरूर तय की गई होगी।

पर मानवेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने के बाद, दिन जैसे-जैसे बीतते गए हर दिन नई नई कहानियां सामने आती रही |पहले कहा गया कि मानवेंद्र सिंह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे पर अपनी पत्नी को चुनाव लड़ा सकते हैं।

लेकिन मारवाड़ की एक भी सीट पर किसी भी राजपूत चेहरे को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया है और तो और खुद मानवेंद्र को राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने झालरापाटन में उतार दिया जबकि पहले कहा गया था, मानवेंद्र खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे।

सियासी दिग्गजों का कहना है कि कांग्रेस का मानवेंद्र सिंह को वसुंधरा राजे के सामने उतारना मानवेंद्र सिंह के राजनीतिक करियर को दावं पर लगाने जैसा है।गौरतलब है कि वसुंधरा राजे झालावाड़ से लगातार पाँच लोकसभा और पिछले 3 बार से लगातार झालरापाटन से विधानसभा चुनाव जीतती आ रही हैं ।

वही राजे ने पिछला चुनाव 60 हजार से ज्यादा मतों से जीता था | ऐसे में मानवेंद्र सिंह की राह बड़ी मुश्किल हो सकती है | लिहाजा मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में जाने के बाद मारवाड़ से एक भी राजपूत नेता को कांग्रेस द्वारा टिकट नहीं देना और मानवेंद्र सिंह खुद चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते थे। फिर भी उनको चुनाव मैदान में उतारना कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।लेकिन मारवाड में एक भी राजपूत क्षत्रप को टिकट नहीं देना और मानवेंद्र सिंह को मना करने पर चुनाव लड़ाना कांग्रेस को भारी पड़ सकता है।

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