क्या इम्यूनोथेरेपी कैंसर से लड़ने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है?

कैंसर एक भयावह रोग है, जो अधिकतर मामलों में असाध्य है। इस बीमारी की ख़ौफ़नाक तस्वीर हम इस तरह से समझ सकते है कि, 2012 में 1.4 करोड़ कैंसर के नए मामले पाए गए और 82 लाख लोग मारे गए। विकसित देशों में, मंहगी एंटीकैंसर दवा की वजह से रोगियों में बीमारी के प्रभाव को कम किया जा सकता है। परन्तु भारत जैसे विकासशील देश जहाँ अधिकांश जनसँख्या अभी भी ग़रीब हैं, इन महंगी दवाओं को जुटाना मुश्किल है।

भारत में कैंसर रोगियों की तादाद बढ़ रही है, जो अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा रही है। अनगिनत प्रयासों के बाद भी, ये बीमारी आज भी लाइलाज़ है, लेकिन यदि समय पर पता चल जाए तो कई ऐसे उपचार है, जो कैंसर से लड़ने में मदद कर सकते है। नवीनतम और उन्नत उपचारों में से एक इम्यूनोथेरपी (Immunotherapy), मानव जाति को आशा दिला रहा है। यह उपचार हमारी अपनी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग करता है। सैद्वांतिक रूप से, ये उपचार बेहद सरल है, जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को जागृत करती है और कैंसरजनिक आक्रमणकारियों पर धावा बोल देती है।

सामान्य बीमारियों में भी शरीर इसी तरह आक्रामक बाह्य जीवाणु (Bacteria) और विषाणु (Virus) से लड़ता है। हालाँकि, कैंसर की बीमारी स्वस्थ कोशिकाओं को उत्परिवर्तित कर देती है, और अंतर्निहित बचाव प्रणाली निष्प्रभावी हो जाती है। यहाँ, एक गुंजाइश ये बचती है की शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ही अधिक प्रभावी बनाया जाये, जो कैंसर से भी लड़ के जीत हासिल कर सके। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (एन.सी.आई.) के अग्रणी एक इम्यूनोखेरेपी विशेषज्ञ, डॉ. स्टीवन रोसेनबर्ग कहते हैं, “स्केलपेल या रे़डिएशन बीम की तरह बाहरी ताकतों का उपयोग करने के बजाय, इम्यूनोथेरपी शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा का फायदा उठाता हैं”। ये रणनीतियाँ सीधे कैंसर को लक्ष्य न बनाते हुए, शरीर की लड़ने की क्षमता पर काम करती है, ये उपचार गोली या अन्तःशिरा टीका (इंट्रावेनस इंजेक्शन) के रूप में स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान न पहुँचाते हुए, प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रबल बनाती हैं।

पिछले एक दशक में, वैज्ञानिक इम्यूनोथेरेपी के वादे को वास्तविकता बनाने के करीब आ गए है। नवीनतम पीढ़ी के कुछ परीक्षणों ने आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न किए हैं। बी-सेल ल्यूकेमिया और निम्फोमा (जोकि कैंसर के प्रकार है) से पीड़ित लोग जिन पर और किसी अन्य उपचार का लाभ नहीं हो रहा था, ऐसे रोगियों पर एक अध्ययन किया गया है। इन कैंसर मरीजों में से 40 फ़ीसदी लोगों में इम्यूनोथेरेपी के उपचार से कैंसर का प्रभाव कम पाया गया। सिएटल शहर के फ्रेड हचिंसन कैंसर रिकॉसर्च सेंटर में शोधकर्ता डॉ. स्टेनली रिडेल के अनुसार, “इस तरह के शुरुआती अन्वेषणों में ही इस प्रकार के परिणाम देखना अभूतपूर्व है”।

शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में कई ऐसे कारक होते है, जो सक्रिय रूप से काम करते है, और इम्यूनोथेरपी में यही कारक मेज़बान का काम करते है। ये कारक प्रतिरक्षित कोशिकाएं या फिर एंटी-बॉडी हो सकती है। प्रतिरक्षा निगरानी प्रणाली (Immune Surveillance System), इन मेजबानों द्वारा कैंसर के नवोविकास के दौरान, ट्यूमर-रोधी प्रतिरक्षा दो तरह से प्रभावी हो सकती है, सहजात (Innate), और अनुकूल (Adaptive)। ट्यूमर-एंटीजन का मेजबान, टी सेल नाम की कोशिकाएँ होती है, और ये ही कोशिकाएँ प्रतिरक्षा निगरानी और सम्पादन के केंद्रीय किरदार की भूमिका का निर्वहन करती है। इसे हम इस तरह से समझ सकते है कि, कैंसर के समय उत्परिवर्तित (Mutated) कोशिकाएं नए प्रकार के प्रोटीन बनाती है, जिन्हें नव-एंटीजन कहते है। टी-कोशिकाएं नव-एंटीजन को पहचान पाती है, यही टी-कोशिकाएं की विशिष्ठ्ता है, और टी-कोशिकाएं प्रतिरक्षा प्रणाली का सबसे मुख्य अंग है। नव-एंटीजन कैंसरजनित कोशिकाओं के कारण उत्पन्न होती है। हमारे शरीर की APCs (Antigen-presenting cells) नाम की सेल्स, इन नव-एंटीजन का प्रस्तुतिकरण करती है। APCs, M.H.C. (Major histocompatibility complex) के माध्यम से एंटीजन को टी-कोशिका को प्रस्तुत करता है। CD40 और CD40L नाम की प्रोटीन, इस प्रक्रिया में सहयोग करती है। इन प्रक्रियायों के उपरान्त टी-सेल्स जागृत हो जाती है और एक प्रकार के दाहक समर्थक Cytokines बनाती है। इन संकेतों के बाद और अधिक टी-सेल्स सक्रिय होकर ट्यूमर से लड़ना शुरू करती है। किन्तु सामान्य परिस्तिथियों में कैंसर जीत जाता हैं। परन्तु, यदि इस प्रक्रिया को अधिक ताकतवर बना दें तो, हमारा शरीर खुद सक्षम होता है, परिणास्वरुप इन ट्यूमर को ख़त्म कर सकता है, जोकि इम्यूनोथेरेपी का मूल सिद्धान्त है।
शोधकर्ताओं को एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा तंश्र की आणविक जटिलताओं को समझने में समय लगा। दो मुख्य आणविक संरचनाएँ थी , CTLA-4 (cytotoxic T-lymphocyte-associated protein 4 ) और PD-1 (Programmed cell death protein 1 ), जिनकी पहचान हुई और ये इम्यूनोथेरेपी आधारित उपचार में मुख्य भूमिका निभाती है। CTLA-4 की खोज 1987 में की गई थी। 1949 में, एलीसन ने विश्व प्रसिद्ध पत्रिका साइंस में एक शोध प्रकाशित किया, जिसमें दिखाया गया कि CTLA-4 रोधी प्रोटीन चूहों में ट्यूमर को कमतर कर देती है। हालाँकि इन जटिलताओं और आरम्भिक नकारात्मक परिणामों के कारण, दवा कंपनियों ने इम्यूनोथेरेपी आधारित उपचार को ठन्डे बस्ते में डाल दिया था। सम्भावनाएँ पुनः जीवित हुईं जब प्रिंसटन, न्यू जर्सी की एक छोटी जैव प्रौद्योगिकी कंपनी, मेडारेक्स, ने एंटी-CTLA-4 के इस्तेमाल को अपने अधिकार में लिया। सन 1999 में, इस कंपनी ने उपरोक्त एंटीबाडी का विज्ञान से दवा तक का सफर तय किया।

आगे के 11 वर्षों तक कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं प्राप्त हुए। 2010, ब्रिस्टल-मायर्स स्क्वीब ने मेडारेक्स को 2 बिलियन डॉलर से अधिक में खरीदा। अधिग्रहण के बाद नए नियोक्ताओं ने एक रिपोर्ट में ये पाया कि, मेटास्टैटिक मेलानोमा (त्वचा के कैंसर) के रोगियों में एंटी-CTLA-4 एंटीबाडी काम कर रही थी। कुछ मरीज़ों को औसतन जीवन के 10 महीने बढ़े। यह पहली बार था, जब किसी भी उपचार ने एक अन्यमित परीक्षणों में विकसित मेलेनोंमा में जीवन बढ़ाया था। ख़शी की बात ये थी कि 25% से अधिक लोगों के जीवनकाल में 2 वर्षों की बढ़ोतरी हुई।

इसी प्रकार दूसरी एंटीबाडी पर शोध होना शुरू हुआ और अच्छे परिणाम भी प्राप्त होना शुरू हुए, और अब नया लक्ष्य था कम से कम दुष्प्रभावों के साथ दवा को आविष्कार करना। 1990 के शुरुवात में, जापान में एक जीवविज्ञानी ने टी कोशिकाओम में एक अणु की खोज की, जिसे उन्होंने क्रमादेशित मृत्यु 1 या पीडी-1 कहा, और जिसे उन्होंने टी कोशिकाओं पर अवरोध के रूप में मान्यता दी। हालाँकि वो स्वयं अपने शोध में कैंसर के बारे में नहीं सोच रहे थे, लेकिन कई लोगों ने इसे प्रभावों को बाद में पहचाना। एक. जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ड्रू पॉमेंट जो अमेरिका के बाल्टिमोर में कॉफी का आनंद ले रहे थे, मेडारेक्स के एक प्रभावी व्यक्ति से मिले और उन्होंने कंपनी से कैंसर में एंटी-पीडी-1 का परीक्षण करने का आग्रह किया। पहला एंटी-पीडी-1 परीक्षण, 39 रोगियों और पांच अलग-अलग कैंसर के साथ, 2008में शुरू हुआ। 2008 तक, डॉक्टरों ने जो देखा वह चौंकाने वाला था, पांच रोगियों में ट्यूमर सिकुड़ रहे थे। अकल्पनीय रूप से कुछ मरीज़ों का बहुत अधिक लाभ हुआ।

फिर भी, शरीर के भीतर ये एंटीबाडी आणविक स्तर पर किस तरह कोशिकाओं को प्रभावित कर रहे थे, यह समझना एक बड़ी चुनौती थी। अन्य कैंसर उपचार या तो काम करते हैं या नहीं करते हैं और इनका प्रभाव लगभग तत्कालिक होता है। कुछ रोगियों को एंटीबॉडी आधारित के उपचार के बंद होने के बाद भी प्रतिक्रिया देते रहे, जिसका सीधा मतलब ये था कि उपचार दवा बंद करने के बाद भी प्रतिरक्षा को बढ़ा रहे थे, इस स्थिति में प्रतिरक्षा में आये मौलिक बदलाव को एक कारण के रूप में माना गया। एंटी-सीटीएलए-4 के कुछ अनावश्यक दुष्प्रभाव भी थे, उदाहरण के लिए, वृहदान्त्र की सूजन या पिट्यूटरी ग्रंथि का विकास। ये सभी एक नए बिंदु या पड़ाव थे, जिन पर तेजी से समझ विकसित करने की जरुरत थी। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में स्टीवन रोसेनबर्ग ने पाया कि टी कोशिकाओं को जोकि ट्यूमर में प्रवेश कर गए थे, उन्हें अनुसन्धान केंद्र में विस्तारित किया, और उन्हें रोगियों में पुनः उपयोग किया, जिससे लाभ प्राप्त हुआ। हालाँकि ये उपचार तभी संभव था जब डॉक्टर ट्यूमर ग्रसित कोशिकाओं तक पहुँच सकें, जिसके कारण ये उपचार कुछ ही परिस्तिथियों में ही संभव था।

संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति जो बिडेन कहते हैं कि, “इम्यूनोथेरेपी” क्रांतिकारी हो सकती है वर्तमान में अमेरिका में 3400 इम्यूनोथेरेपी परीक्षण चल रहे हैं और दुनिया भर में ये परीक्षण हो रहे हैं। ये परीक्षण यह साबित करेंगे कि इम्यूनोथेरेपी न केवल एक सुरक्षित है, बल्कि कुछ कैंसर से ल़ड़ने का एक बेहतर तरीका भी है। जो अंततः लोगों को कीमोथेरेपी के जीवन-प्रभाव और सर्जरी के बाद सर्जरी की समस्या को ख़त्म कर सकता है।

जबकि वैज्ञानिक लंबे समय से कैंसर के खिलाफ शरीर की अपनी सुरक्षा को मजबूत करने की धारणा से आकर्षित हुए हैं, लेकिन कई कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ा- सबसे बुनियादी कठिनाई ये थी कि ट्यूमर स्वस्थ कोशिकाओं से उत्पन्न होती है और इनमें अनुवांशिक उत्परिवर्तन होने से प्रतिरक्षा प्रणाली की पकड़ में नहीं आते। यही कारण है कि पहली पीढ़ी की प्रतिरक्षा में, प्रो. जेम्स एलीसन ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में जोकि अब ह्यूस्टन में एमडी एंडरसन अस्पताल में है, ने यह पता लगाया कि कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने और उन पर हमला करने के लिए प्रतिरक्षा कोशिकाओं को कैसे प्रशिक्षित किया जा सकता है। टी कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करने और नष्ट करने से रोका जाता है। संयमित रूप से, अवरोधक दवाएं प्रतिरक्षा कोशिकाओं को उजागर कर कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने की अनुमति देती हैं- और सामान्य कोशिकाएं नहीं। फिर 2010 में, प्रो. रोसेनबर्ग ने तथाकथित काइमरिक एंटीजन रिसेप्टर थेरेपी, या सी.ए.आर. थेरेपी (CAR) से उत्साहजनक परिणाम प्रकाशित किए। जिसमें उन्हें ट्यूमर कोशिकाओं को लक्षित करने के लिए आनुवंशिक रूप से रोगी की टी कोशिकाओं को संशोधित किया। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में कार्ल जून के नेतृत्व में एक समूह ने सी. ए. आर. थेरेपी के आकर्षक प्रतिक्रियाओं को रिपोर्ट करना शुरू किया। ल्यूकेमिया के रोगियों में ये पद्धति काफी कारगर सिद्ध हुई। हाल ही में, न्यू ऑरलियन्स की एक बैठक में, जून की टीम और एक अन्य न्यूयॉर्क स्थित मेमोरियल स्लोन-केटरिंग कैंसर सेंटर की टीम ने बताया कि उनके अध्ययन में टी सेल थेरेपी (CAR) ने 75 वयस्कों और बच्चों में से 45 में, ल्यूकेमिया को ख़त्म किया, हालाँकि बाद में मरीजों में कैंसर फिर पाया गया। CAR थेरेपी अब कई परीक्षणों का केंद्र बिंदु है। शोधकर्ताणों को उम्मीद है कि यह प्रभावी रूप से, कैंसर पर हमले को लक्षित कर सकता है।

अभियान्त्रित टी कोशिकाएं (CAR) अभी भी प्रयोगात्मक दौर में हैं, लेकिन एंटीबॉडी आधारित थेरेपी (CTLA और Anti PD-1) धीरे-धीरे मुख्यधारा में आ रही हैं। कम से कम पांच प्रमुख दवा कंपनियां, शुरुआती हिचकिचाहट के बाद, एंटी-पीडी -1 जैसे एंटीबॉडी विकसित कर रही हैं। 2011में, अमेरिकी खाद्य और औषधि प्रशासन ने मेटास्टेटिक मेलेनोमा के लिए ब्रिस्टल- मायर्स स्क्विब के एंटी-सीटीएसए-4, जिसे Ipilimumab कहा जाता हैं, को मंजूर किया है। इनकी लागत अधिक है और कंपनी एक थेरेपी के लिए 120,000 डॉलर का शुल्क लेती है। 2012 में, हॉपकिंस के सुज़ैन टोपालियन, येल विश्विद्यालय के मारियो सजनोल और उनके सहयोगियों ने लगभग 300 लोगों में एंटी-पीडी-1 तेरेपी के लिए परिणाम की सूचना दी। उन्होंने इस साल की शुरूआत में एक अद्यतन सूचना प्रदान की। ट्यूमर, 31% मेलेनोमा के, 29% गुर्दे के कैंसर के, और 17%फैफड़ों के, कैंसर के रोगियों में आधे या आधे से अधिक से सिकुड़े पाए गए। ब्रिस्टल-मायर्स स्कि्वब ने इस वर्ष सूचना दी कि 1800 मेलेनोमा रोगियों में जिनका Ipilinumab के साथ इलाज किया गया था, 22% लोग 3 साल बाद भी जीवित थे। जून में, शोधकर्ताओं ने बताया कि लगभग एक-तिहाई मेलेनोमा रोगियों में Ipilimumab एंटी-पीडी-1 के संयोजन ने गहरी और तेजी से ट्यूमर पर काम किया। पीडी-1 मार्ग को अवरुद्ध करने वाली दवाएं अभी तक जीवन का विस्तार करने के लिए साबित नहीं हुई हैं, हालंकि अब तक जीवित रहने की दर डॉक्टरों को आशावादी प्रतीत होती है। मरीज को खोने से दुःखी चिकित्सकों के लिए, ये संख्या एक उम्मीद लेकर आती है, जो वे कुछ साल पहले सोच भी नहीं सकते थे। मेटास्टेटिक कैंसर वाले लोगों के लिए अभी भी हमारी लम्बी लड़ाई है। आज की इम्यूनोथेरेपी हर किसी की मदद नहीं करती है, और शोधकर्ता इस उम्मीद में है कि कैसे अधिक से अधिक लोगों का सम्पूर्ण रूप से लाभ हो। वे बायोमार्कर की पहचान करने की कोशिश में है कि कैसे उपचारों को अधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है। यह संभावना है कि ये इम्यूनोथेरेपी, वर्तमान में कुछ कैंसर को कई वर्षों तक रोक सकती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय लॉस एंजिल्स के इम्यूनोथेरेपी विशेषज्ञ डॉ. एंटोनी रिबास ने कहा- “यह कैंसर इम्यूनोथेरेपी अनुसंधान के लिए एक रोमांचक समय है”।
फिर भी इस तरह की नई रणनीति का परीक्षण में असंभव सी लगने वाली परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसका प्रभाव कितना है, ये इस पर निर्भर करता है कि दवा कितनी अच्छी है और कितनी लक्षित होती है। इसी कारण से, इम्यूनोथेरेपी मोटे तौर पर अति-वैयक्तिकृत दवा है, और इसके लिए अति-वैयक्तिकृत परिक्षण की आवश्यकता होती है। इम्यूनो-ऑन्कोलॉजी ने कैंसर के खिलाफ हमले की कई तरीके है, लेकिन शोधकर्ताओं के बीच जो बहुत उम्मीद पैदा करती है, वह है प्रतिरक्षा जांच निषेध (इम्यून चेकपॉइंट इन्हीबिटर)। कई विशेषज्ञ इम्यून-ऑन्कोलॉजी की रीढ़ के रूप में प्रतिरश्रा जांच निषेध को देखते हैं। प्रतिरोध के तंत्र की पहचान करने, बायोमार्कर को ट्रैक करने और भविष्य कहनेवाला प्रीक्लिनिकल मॉडल विकसित करने पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। वैज्ञानिक देख रहे हैं कि परीक्षण सूचनाओं का उपयोग प्रतिरक्षात्मकता के विकास को निर्देशित करने के लिए कैसे किया जा सकता है, जिसमें संयोजन इम्यूनोथेरेपी भी शामिल है। एक और उत्साहजनक विकास इम्यून चेकपॉइंट इन्हीबिटर को वैयक्तिकृत करने की हमारी क्षमता है, जो संभावित उत्तरदाताओं को चिकित्सा से पहले गैर-उत्तरदाताओं से अलग करना और दुष्प्रभावों को कम करना है।

आगे के लिए उम्मीद होने के साथ, यह भी चिंता का विषय है कि, ये उपचार काफी मंहगा होता है, हमारे देश के लिए तो ये असंभव प्रतीत होता है। फिलहाल, प्रतिरक्षा-आधारित दवाओं के साथ एक परीक्षण पर चाहे वह सरकार द्वारा वित्त पोषित हो या एक दवा कंपनी द्वारा, प्रति वर्ष लगभग 200,000 डॉलर का खर्च आता है। यह चिकित्सा प्रभावशाली नहीं है क्योंकि निवेश की एक बड़ी राशि रोगियों के जीवन काल को कुछ ही वर्षों-महीनों के लिए बढ़ा पाती है। चूंकि प्रमुख कैंसर विशेषज्ञ भविष्यवाणी करते हैं कि प्रतिरक्षा-आधारित चिकित्सा अंततः कीमोथेरेपी की जगह ले सकती है, इस शोध को निवेशकों की आवश्यकता होगी।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय लॉस एंजिल्स फैफड़ों के इम्यूनोथेरेपी विशेषज्ञ प्रो. स्टीवन डुबनेट ने कहा “मुझे लगता है कि हम सभी को उम्मीद थी कि एक बिंदु आएगा जहां मानव इम्यूनोथेरेपी के बारे में हमारा ज्ञान महत्वपूर्ण बाधाओं को दूर करने के लिए पर्याप्त होगा। यह पारित करने के लिए आया है, और, हालाँकि कई शोधों को आगे के शोध में संबोधित किया जा बाकी है, आशावाद निश्चित रूप से आवश्यक है।” कैंसर को हराने की लड़ाई अभी काफी लम्बी हैं, विश्व भर के वैज्ञानिक इस पर अनुसन्धान कर रहे है। अभी भी कई ऐसे पड़ाव है, जिन्हें हमे पार करना है, जैसे दवा के दुष्प्रभावों को कम करना, दवा को आम आदमी के जद में लाना। एक महत्वपूर्ण पड़ाव ये भी है कि एक ऐसी दवा बनाई जा सके, जो सभी कैंसर के मामलों में कारगर हो। हम इस उम्मीद में है कि एक नया सवेरा होगा, जहाँ कैंसर से डरने की जरुरत नहीं होगी, हम किसी अपने को नहीं खोयेंगे। इस लड़ाई में मानव जाति के हाथ में जो सबसे कारगर हथियार है वो है हमारी अपने शरीर की प्रतिरक्षा प्रक्रिया आधारित प्रतिरक्षा चिकित्सा (इम्यूनोथेरेपी)। इम्यूनोथेरेपी एक ज्वलंत विषय है अनुसन्धान के लिए, जिसमें अधिक से अधिक अनुसंधान की जरुरत है।

About the authors-

Vikas Pandey: Post-Doctoral Researcher, Department of Cardiology, University of California , Los Angeles (UCLA), Los Angeles, CA, USA

Bharti Bisht: Scientist working on Immuno-Oncology, Department of Thoracic Surgery, David Geffen School of Medicine, UCLA, Los Angeles, CA, USA

Mansh K. Paul: Scientist working on Immuno-Oncology, Pulmonary Medicine, David Geffen School of Medicine, UCLA, Los Angeles, CA, USA

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