वंशवाद बनाम लोकतंत्र के बीच होगी जोधपुर लोकसभा चुनाव में लड़ाई

क्या २१वी सदि के भारतीय राजनीति में अब तक वंश देख कर वोट दिया जाता है? क्या भारतीय राजनीति आज तक वंशवाद के बेड़ियों मे जकड़ा हुआ है? आजादी के बाद से राम मनोहर लोहिया तथा जयप्रकाश नारायण जैसे कई नेताओं ने भारतीय राजनीति में वंशवाद के खिलाफ मुहिम छेड़ी। पर उन सब मुहिमो ने भी आगे चलकर कुछ नए राजनीतिक परिवारों को जन्म देने का काम मात्र ही किया।

आज की सच्चाई यही है कि भारतीय राजनीति आज भी वंशवाद मे जकड़ी नजर आ रही है और इसमें अग्रणी भूमिका देश कि सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ही निभा रही हैं।

वंशवाद के सबसे नए मिसाल मे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को वीआईपी सीट जोधपुर से उतारा गया। वैभव इससे पहले किसी भी प्रकार के सक्रिय राजनीति में नही रहे हैं। ऐसे में सवाल तो उठता है कि आखिर क्या उन्हे सिर्फ अशोक गहलोत के बेटे होने के कारण ही उम्मीदवारी मिली?

एक आम कार्यकर्ता जिवन के अमुल्य साल पार्टी के नाम खपा दिया करता है। चुनाव के पोस्टर से लेकर रैली की सीट हर चीज अपने हाथों से लगाता है। पर हमारे भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना यही है कि टिकट बांटते समय इन कार्यकर्ताओं के बारे में कभी नहीं सोचा जाता। टिकट तो नेताजी के बेटे को ही दे दी जाती है चाहे उनकी कोई योगदान हो या न हो।

हालांकि वैभव गहलोत जिनके खिलाफ चुनाव लड़ेगें उनकी कहानी कुछ अलग है। भाजपा के गजेन्द्र सिंह शेखावत पिछले पांच सालों से जोधपुर के सांसद रहे हैं और इस बार उन्हे दोबारा इस सीट से उतारा गया है। वैभव के उलट, गजेन्द्र छोटे से उम्र से ही राजनीति से जुड़े रहे हैं।

अपना रास्ता खुद बनाने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं गजेन्द्र। एक दम शुरूआती पायदानो से अपने सफर को शुरू करने वाले गजेन्द्र ने आज अपने लिए एक खास स्थान का निर्माण किया है। एक तरह से यह कहना गलत नहीं होगा कि इस साल जोधपुर का चुनाव वंशवाद बनाम लोकतंत्र के बीच होने वाली है। विजय श्री उसी को प्राप्त होगी जिसे जनता चाहेगी।

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