जानिए क्यूँ माना जाता है राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत को जाट विरोधी !!

राजस्थान की राजनीति में हमेशा से ही जाति और समाजो का एक विशेष महत्व रहा है। हर जाति हर समाज के लोगों मे यह अभिलाषा होती है कि उनके समाज के प्रतिनिधि विधानसभा, लोकसभा और मंत्रीमंडल तक पहुंचे। ऐसे में राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर समय समय पर यह आरोप लगता आया है कि उन्होंने जान बूझकर जाट समाज को प्रदेश के राजनीति के मूल स्रोत से दरकिनार करने का काम किया है।

लोगों कि माने तो बीकानेर, गंगानगर, भरतपुर तीनों जाट बाहुल्य सीटों को आरक्षित करवाने में अशोक गहलोत का बड़ा हाथ माना जाता रहा है । इतना ही नही, लोग तो यहां तक कहते हैं कि जोधपुर से तीन जाट बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र को पाली में शामिल कर जोधपुर से जाटो का सफाया करने का काम गहलोत ने किया। आरोप है कि बिलाड़ा, भोपालगढ़, मेड़ता, जायल, खाजूवाला, जैसे कई जाट बाहुल्य गढ़ थे जो आरक्षित करवा दिये जिससे जाट विधायकों की संख्या घटी है।

लोग तो यहां तक भी कहते हैं कि एक के बाद एक जाट नेता जैसे परसराम मदेरणा, हरेंद्र मिर्धा, महिपाल मदेरणा, राजेन्द्र चौधरी, हेमाराम जी आदि के राजनीतिक जीवन को खत्म करने के पिछे अशोक गहलोत का एक बहोत बड़ा हाथ रहा है।

आरोप तो यहां तक कहते हैं कि अशोक गहलोत अब राजस्थान सरकार मे मंत्री और जाट नेता हरीश चौधरी को दरकिनार करने के कोशिश में लगे हैं।

इन आरोपों मे कितनी सत्यता है यह तो शायद ही कोई कह पाएगा पर इस सच्चाई को कोई नहीं झुठला सकता कि जाट समाज चलते समय के साथ राजस्थान के राजनीति के केन्द्र से दूर ही जाता दिखा है। 1998 में राजस्थान विधानसभा मे लगभग 54 जाट विधायक हुआ करते थे लेकिन अब तो गिनेचुने ही रह गये हैं।

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