Rohit Sardana Makes Facebook Post Targeting Anti India Gang

इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है. फिर एक नैरेटिव सेट हो रहा है.
जैसे जेएनयू में हुआ था.
‘देश के टुकड़े होने के नारे लगे ही नहीं. वीडियो झूठा है. पाकिस्तान ज़िंदाबाद कहा ही नहीं गया. कैमरे झूठ बोल रहे हैं.’
जैसे कैराना में हुआ था.
‘लोग घर छोड़ कर गए ही नहीं. घरों पे लगे ताले झूठे हैं. कोई पलायन हुआ ही नहीं. बरसों बरस से पुश्तैनी मकान छोड़ कर और जगहों पर बस गए लोग झूठ बोलते हैं. मीडिया झूठ दिखा रहा है.’
जैसे मालदा में हुआ था.
‘कोई हंगामा या प्रदर्शन हुआ ही नहीं. ये टीवी वाले तो झूठ दिखा रहे हैं. बंगाल के तो किसी अखबार में छपा ही नहीं है. थाने में आग लगा दी ? अच्छा? वो तो कोई गुंडे थे, दंगा थोड़े न हुआ !’
जैसे धूलागढ़ में हुआ था.
जैसे दादरी में हुआ था.
जैसे कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की मौत पर हुआ था.
या फिर जैसे कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ था.
एक कहावत है, जब किसी को यकीन न दिला सको – तो उसे भ्रमित कर दो. इफ यू कांट कन्विन्स देम, कन्फ्यूज़ देम. उनके सामने इतने सारे झूठ परोस दो कि वो मजबूरन उनमें से किसी झूठ को ही सच मानने को मजबूर हो जाएं.
इसी लिए करणी सेना के कथित ‘गुंडे’ जब भंसाली के विरोध में सड़क पर उतरते हैं, तो उन्हें आतंकवादी कहने में देर नहीं लगाई जाती. लेकिन कासगंज के आरोपियों के यहां जब बंदूकें और होटलों में देसी बम मिलते हैं – तो उन्हें आतंकवादी कहना तो दूर उनकी पैरवी के लिए लोग टीवी-अखबार छोड़िए, घर में बनाए जाने वाले सुतली बमों जैसे देसी वीडियो तक बना बना कर मैदान में कूदते हैं.
तिरंगे की यात्रा निकालने पर झगड़ा हुआ या नहीं, इस पर जान गंवाने वाले लड़के की बिलखती मां की गवाही झूठी हो जाती है. उनकी गवाही सही हो जाती है जिन पर उस सोलह साल के बच्चे को मार देने का आरोप लगता है !

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की इजाज़त नहीं ली गई थी जैसे तर्क दिए जाते हैं. और जब वो कुतर्क फेल हो जाते हैं तो तिरंगा ले के निकलने वालों को ‘भगवा गुंडे’ क़रार दे दिया जाता है.
ये संज्ञाएं गढ़ने वाले वही लोग हैं जो हरियाणा के जाटों पर ‘बलात्कारी’ होने का झूठ चस्पां करने में पल भर नहीं सोचते. और फिर अपने उस झूठ को सच साबित करने के लिए झूठी गवाहियां भी गढ़ते हैं, सुबूत भी.
ये वही लोग हैं जिन्हें खाने की थाली का धर्म पता है, स्कूल की प्रार्थना का धर्म पता है, इमारतों की दीवारों के रंगों का धर्म पता है, योग का धर्म पता है, सूर्य नमस्कार का धर्म पता है, वंदे मातरम का धर्म पता है, भारत माता की जय का धर्म पता है – बस आतंक का धर्म नहीं पता !
तय कीजिए, झूठ ये फैलाते आए हैं – या वो फैला रहे हैं जिन्होंने इनके झूठ की पोलें खोलनी शुरू की तो इनकी चूलें हिलने लगी हैं?

And here is the english translation of the post done by Kshitij Mohan Singh

History is repeating itself. A narrative is being propagated.

Just like it happened in JNU.
“No slogans calling for breaking India were raised”.
“Slogans of Pakistan Zindabad were not raised”.
“The videos are fabricated”.
“The cameras are lying”.

Just like it happened in KAIRANA.
“People did not flee locking their homes.”
“There was no exodus.”
“Those who fled Kairana and speaking on camera are lying.”
Media is not portraying the truth.

Just like it happened in MALDA.
“There was no riot at all.”
“Oh ! A few houses and police station were torched? They were just anti-social elements.”
“A law and order issue should not be called communal riot.”

Just like it happened in DHULAGARH.
Just like it happened in Prashant Pujari murder case.
Just like it happened with the Kashmiri Pandits.

There is a famous saying, “If you can’t convince people, confuse them.” Lies are being sold, and various alternative narratives are being set.

As a matter of fact, when Karni Sena comes out on road and does violence, the same media doesn’t mince words in declaring them terrorists and “Rajput” goons. On the other hand, when bombs, explosives and cache of arms is recovered from the homes of the accused in Kasganj, these people come together to protect them.

The statements of the deceased 19-year old Chandan’s mother becomes lies. But the statements of accused who stoned the Tiranga Yatra become a correct alternative narrative.

Hollow, illogical reasons are dished out to give the accused a a long rope. The death of Chandan and Rahul are tried to be covered up by arguing that there was no permission to hold rallies, those who were taking the rallies made provocative statements, etc. When nothing works out, they are termed as “saffron goons”.

These are the same people who know the religion of food.
They know the religion of a school prayer.
They know the religion of Yoga.
They know the religion of Surya Namaskar.
They know the religion of Vande Mataram.
They know the religion of Bharat Mata ki Jai.
They only do not know the religion of terror attacks and riots.

The onus is on you to decide who is lying – those who are getting restless as their narratives have been exposed time and again, or those who are exposing them !

– Translated by Kshitij Mohan Singh

Comments

comments