भाजपा की बंगाल विजय के असली सूत्रधार स्वयंसेवक शिवप्रकाश

सभी कयासों और अटकलों को दरकिनार करते हुए जब गुरूवार को लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आये तब सब हक्के बक्के रह गये। सभी राजनीतिक पंडितो के अंदाजो को कोसो पीछे छोड़ते हुए नरेन्द्र मोदी और भाजपा के नाम की ऐसी भयानक लगर चली कि सभी और राजनीतिक दल बह कर कंहा निकल गये यह कोई नहीं जानता। इसी बीच सर्वाधिक चर्चा पश्चिमी बंगाल की हुई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो कि प्रधानमंत्री बनने के सपने बुन रही थी, उनकी पार्टी भी अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह मोदी लहर के ऐसे चपेट में आई कि उसके छक्के छुट गये।

पश्चिम बंगाल में कुल 42 आसनों मे भाजपा 18 जीती है जबकि विधानसभा उपचुनावो मे 8 मे से 4 सीट भाजपा को मिली है। यह बंगाल के परिप्रेक्ष्य में भाजपा की सर्वश्रेष्ठ और अभूतपूर्व प्रदर्शन है। इस प्रदर्शन ने न केवल राजनीतिक पंडित अपितु भाजपा के समर्थकों को भी हैरान कर दिया है। सभी के मन एक ही प्रश्न है, आखिर बंगाल में कौन सा चमत्कार हुआ है।

इस जगत में चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता और न ही ऐसा कुछ हुआ है। दरअसल, बंगाल में भाजपा के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन के पीछे है एक स्वयंसेवक का अथक और एकनिष्ठ परिश्रम। हम बात कर रहे हैं भाजपा के सांगठनिक महा मंत्री श्री शिवप्रकाश जी की।

शिवप्रकाश जी पर यह दायित्व था कि वह बंगाल में भाजपा के निरिक्षणकर्ता श्री कैलाश विजयवर्गीय के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करे की श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मस्थली में अब भगवा झंडा लगराए। और इस अभियान के सफलता के लिए शिवप्रकाश जी ने बंगाल का चप्पा चप्पा छान डाला।

जहां बंगाल में सामने से दिलीप घोष, राहुल सिन्हा और मुकुल रॉय जैसे नेता चंद्रगुप्त मौर्य की तरह भाजपा का नेतृत्व कर रहे थे तो वहीं पर्दे के पीछे से रह कर शिवप्रकाश जी किसी चाणक्य की तरह उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। एक राष्ट्रीय स्तर के नेता होने के बावजूद भी शिवप्रकाश जी किसी आम कार्यकर्ता की तरह काम करना पंसद करते हैं और ऐसा ही उन्होंने बंगाल में किया।

अगर शिवप्रकाश जी चाहते तो वह बड़ी सरलता से बंगाल के विभिन्न प्रांतों के नेताओं से रिपोर्ट लेकर अपनी रणनीति बना सकते थे। परंतु शिवप्रकाश जी थोड़ी दूजे किस्म के नेता है। वह खुद हर शहर, हर गांव, हर इलाके और हर बूथ तक पंहुचे। उन्होंने खुद अपनी आंखों से बंगाल के चप्पे चप्पे को देखा और समझा। हर बूथ मे बैठकें की, वहां के लोगों से वार्तालाप किया, उन्हे समझा, उनके दुख सुख को समझा। और इन सब के बाद अपनी रणनीति बनाई।

बंगला भाषा में निपुण और बंगाली संस्कृति के प्रति विशेष चाह रखने वाले शिवप्रकाश जी को बंगाल के जनता से जुड़ने मे ज्यादा समय नहीं लगा। स्वामि विवेकानंद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आदर्श मानने वाले शिवप्रकाश जी बंगाली अस्मिता को बहोत अच्छे से जानते और समझते हैं। और शायद यही कारण है कि उन्हे बंगाल का दायित्व दिया गया है।

हालांकि यह भी सच है कि शिवप्रकाश जी का कार्य अब तक सम्पन्न नही हुआ है। लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक प्रदर्शन उनके उस अभियान का केवल आधा रस्ता है जिसका लक्ष है ममता बनर्जी की सरकार को बंगाल की भूमि से उखाड़ कर फेंक देना। और अपने लक्ष्य की तरफ यह कर्मयोगी स्वयंसेवक तेज गती से अग्रसर है।

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