अगर सचिन पायलट बने मुख्यमंत्री तो क्या गुर्जर हो जाएंगे एसटी में शामिल

राजस्थान में आरक्षण एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कई वर्षों से आरक्षण को लेकर विभिन्न समाजों में भी खींचतान चलती रही है। इस वर्ष 2 अप्रैल और 10 अप्रैल को भी आरक्षण के बहाने अनेक प्रकार के प्रदर्शन हुए हैं। किंतु हम याद करें वर्ष 2007 को तो ध्यान में आता है कि जिस प्रकार से कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में गुर्जर समुदाय ने एस टी अर्थात अनुसूचित जनजाति में आरक्षण की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था, वह आरक्षण का आंदोलन पूरे देश भर में ही नहीं अपितु दुनिया भर में एक बड़ा मुद्दा बन गया था। सेना के एक रिटायर्ड कर्नल के नेतृत्व में गुर्जर जाति के नौजवान जिस प्रकार से हिंसा पर उतारू हो गए थे.. राष्ट्रीय राजमार्ग बंद कर दिए गए थे.. ट्रेनों की पटरियां उखाड़ दी गई थी.. जिस प्रकार से अराजकता का वातावरण बनाया गया था …आखिर उसकी परिणिति क्या हुई? कुछ लोग कहते हैं कि आरक्षण का वह गुर्जर आंदोलन उस समय असफल अवश्य हो गया, किंतु उस असफलता में से एक नई नींव पड़ी गुर्जर समुदाय को राजनीतिक रूप से मजबूत करने की।

याद कीजिए उस दौर को एक तरफ प्रदेश का गुर्जर समुदाय एसटी अनुसूचित जनजाति में आरक्षण की मांग के लिए लड़ रहा था। वहीं दूसरी ओर मीणा समाज के कद्दावर नेता एसटी अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में किसी प्रकार के बंटवारे को सहन करने को तैयार नहीं थे। राजनीतिक तौर पर कहा जा सकता है कि उस समय गुर्जरों ने मीणा समुदाय से हार स्वीकार कर ली, किंतु उस हार में से नींव पड़ी गुर्जर समाज को राजनीतिक रुप से मजबूत बनाने की। उस समय यह महसूस किया गया कि यदि गुर्जर समाज में भी कोई बड़े कद्दावर और दमदार नेता होते तो शायद उनकी बात को सरकार ज्यादा वजन देती।

समय बदला …राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान सचिन पायलट के हाथ में आई। राहुल गांधी का विश्वास जीतकर सचिन पायलट ने अपनी छवि को भी निखारा और अपने कार्य की गति भी बढ़ाई। सचिन पायलट वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजेश पायलट के पुत्र हैं। अपने पिता की विरासत को संभालने और सहेजने के साथ साथ सचिन पायलट ने गुर्जर समाज को पुनः एकजुट करके कांग्रेस के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण काम किया।

सचिन पायलट को कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। राहुल गांधी का वरदहस्त भी सचिन पायलट पर है। इन परिस्थितियों में प्रदेश का गुर्जर समाज यह सोच रहा होगा कि यदि सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनते हैं तो उनकी अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में शामिल होने की वर्षों पुरानी लंबित मांग के समाधान की संभावना मजबूत होती है। स्वाभाविक रूप से सचिन पायलट पर भी समाज का दबाव होगा कि वह यदि मुख्यमंत्री बनते हैं तो गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करवा कर आरक्षण का लाभ पहुंचाएं। गुर्जर आरक्षण एक ऐसा ही विषय है कि वह आग आज भले ही बुझ गई हो लेकिन राख के नीचे अंगारे अभी भी जल रहे हैं। दबे हुए अंगारे कब शोले बन जाएं, कोई नहीं कह सकता। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि गुर्जर समाज ने सचिन पायलट को मजबूत कर के मुख्यमंत्री बनाने की ठान रखी है और अपने समाज के मुख्यमंत्री के माध्यम से अपनी वर्षों पुरानी मांग को मनवाने की योजना भी उनके दिमाग में हो सकती है। जिस गुर्जर आंदोलन में दर्जनों युवकों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा.. ऐसे बलिदान को गुर्जर समाज के नेता आसानी से भूलने वाले नहीं हैं। अब देखना यह होगा कि राजस्थान में चुनाव परिणाम क्या रहता है.. और चुनाव परिणाम के बाद बनने वाली सरकार कौन सी पार्टी की बनती है ? सचिन पायलट मजबूत होते हैं तो क्या मीणा समाज अपने आप को ठगा सा महसूस करेगा ? क्या इस विधानसभा चुनाव में गुर्जर समुदाय एकजुट होकर सचिन पायलट को मजबूत करेगा .. क्या इस विधानसभा चुनाव में गुर्जर और मीणा समाज अपने आरक्षण के अधिकार और उसकी रक्षा के लिए फिर से एक दूसरे के आमने सामने होंगे ? खैर ! देखते जाइए तेल देखिए तेल की धार देखिए.. मतदान और उसके बाद राजस्थान का परिणाम देखिए।

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